बुद्ध पूर्णिमा 2019: जानिए कैसे गिलहरी की सीख से सिद्धार्थ बनें थे बुद्ध

बुद्ध पूर्णिमा 2019: जानिए कैसे गिलहरी की सीख से सिद्धार्थ बनें थे बुद्ध

नई दिल्ली: एक समय कपिलवस्तु के राजकुमार सिद्धार्थ बुद्धत्व की खोज में भटक रहे थे। उनकी हिम्मत टूटने लगी। एकबारगी तो उन्हें लगा कि सत्य और ज्ञान की खोज में उनका गृह त्यागना व्यर्थ गया। कहा जाता है कि ऐसे वक्त में एक नन्ही गिलहरी की एक सीख ने उन्हें सिद्धार्थ से गौतम बुद्ध बनने में मदद की। दरअसल हुआ यह कि सिद्धार्थ के मन में यह विचार उठने लगा कि क्यों न वापस राजमहल चला जाए। अंत में वे कपिलवस्तु की ओर लौट पड़े। चलते-चलते राह में उन्हें बड़े जोर की प्यास लगी। सामने ही एक झील थी। वे उसके किनारे गए। तभी उनकी दृष्टि एक गिलहरी पर पड़ी।

गिलहरी बार-बार पानी के पास जाती, अपनी पूंछ उसमें डुबोती और उसे निकाल कर रेत पर झटक देती। उसकी इस कोशिश पर सिद्धार्थ सोच में पड़ गए कि यह नन्ही गिलहरी क्या कर रही है? कहीं ऐसा तो नहीं कि वह झील सुखाने का प्रयास कर रही है। पर इससे तो यह काम कभी पूरा नहीं हो पाएगा। तभी उन्हें लगा कि गिलहरी उनसे कुछ कहना चाह रही है। गिलहरी उनसे कहना चाहती है कि मन में जिस कार्य को करने का एक बार निश्चय कर लिया जाए, तो उस पर अटल रहने से वह हो ही जाता है। बस हमें अपना काम करते रहना चाहिए। तभी सिद्धार्थ की तंद्रा भंग हो गई। उन्हें अपने मन की निर्बलता महसूस हुई। वे वापस लौटे और फिर तप में लग गए। निरंतर प्रयास से उन्होंने बुद्धत्व को प्राप्त कर लिया।

महात्मा बुद्ध का अपने निर्णय पर सोच-विचार करना मानव स्वभाव है। यही बुद्ध की प्रकृति भी है। उनके इस सोच-विचार से दो बातें सीखी जा सकती हैं। एक तो यह कि असफलता मिले या सफलता, हमें निरंतर प्रयास में लगे रहना चाहिए। दूसरा यह कि मनुष्य जीवन भर सीख ग्रहण करता रह सकता है। चाहे महान लोगों का जीवन चरित हो या छोटे-से जीव का सामान्य सा कार्य, हम सीख किसी से भी ग्रहण कर सकते हैं। जिस तरह से महात्मा बुद्ध ने प्रयास किया और बुद्धत्व को प्राप्त किया, ठीक उसी तरह हम सामान्य लोग भी बुद्धत्व को प्राप्त कर सकते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि हम सभी के अंदर बुद्धत्व के बीज मौजूद हैं। निरंतर कर्म पथ पर चलते रहने और लगातार कोशिशों से हम भी बुद्धत्व को प्राप्त कर सकते हैं।

महान साहित्यकार राहुल सांकृत्यायन महात्मा बुद्ध के जीवन व दर्शन से अत्यंत प्रभावित थे। उन्होंने अपने जीवन काल में बौद्ध धर्म अपना लिया था। राहुल महात्मा बुद्ध पर किए गए अपने शोधों और किताबों में बताते हैं कि वे महात्मा बुद्ध के जीवन की दो बातों से अधिक प्रभावित थे। बुद्ध ने ज्ञान पाने के लिए जीवन से संन्यास लिया, लेकिन अपने संदेशों में वे हमेशा कहते रहे कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी सच्चा ज्ञान पाया जा सकता है। करना सिर्फ इतना होगा कि हमें अपने कर्म पथ पर निरंतर चलते रहना होगा।

राहुल सांकृत्यायन की बातों से स्पष्ट है कि कर्म में ही शांति है। उसे उदात्त चेतना के साथ करना ही आध्यात्मिक जीवन जीने का उपक्रम है। अब यहां सवाल यह उठता है कि आप किस तरह का कर्म कर रहे हैं और कैसे व किसके लिए कर रहे हैं? आप जो भी कार्य करें, वह देश या समाज के हित में हो। ऐसा कार्य जिसमें न सिर्फ आपको रस आ रहा हो, आनंद मिल रहा हो, बल्कि संपूर्ण देशवासियों को भी आनंद मिले, रस मिले। यदि आनंद मिल रहा है, तो शांति भी मिलेगी। यदि शांति नहीं मिल रही है, तो कोई भी धर्म और उसका संदेश, ग्रंथ और उसके अक्षर बेकार हैं। तभी तो बुद्ध का संदेश है ‘अप्प दीपो भव’। अपने दीपक स्वयं बनें।

दूसरी बात राहुल सांकृत्यायन बताते हैं कि यात्रा से भी हमें सच्चा ज्ञान मिल सकता है। इससे व्यक्ति और समाज दोनों का हित सधता है। व्यक्ति और समाज के हित के लिए ही बुद्ध जीवन पर्यत भ्रमण पर रहे। हम जितनी अधिक यात्रा करेंगे, हमारी दृष्टि उतनी ही विस्तृत होगी और हमें सच्चा ज्ञान भी तभी मिलेगा। आदिम मानव ने भी यात्राओं के अलग-अलग चरण में आग, अनाज या फिर भाषा का आविष्कार किया।

ओशो महात्मा बुद्ध के बारे में एक बात स्मरण रखने के लिए कहते हैं कि उनका जोर हमेशा द्रष्टा बनने पर रहा है। वे स्वयं द्रष्टा हैं। यहां द्रष्टा का अर्थ है सत्य का दर्शन करना। वे नहीं चाहते थे कि सामान्य लोग दर्शन के ऊहापोह में उलझें। दार्शनिक ऊहापोह के कारण ही करोड़ों लोग दृष्टि को उपलब्ध नहीं हो पाते हैं। सस्ते में सिद्धांत मिल जाएं, तो सत्य की खोज कोई नहीं करना चाहता है। बुद्ध अपने संदेशों में किसी दर्शन का अनुसरण करने को नहीं कहते हैं, बल्कि वे केवल उन लोगों को आगाह करते हैं, जो आंखें होते हुए भी ज्ञान के प्रति आंखें मूंदे हुए हैं, पर उनके भीतर प्रकाश को देखने की प्यास है। ऐसे लोग जब बुद्ध के पास गए, तो उन्होंने उन लोगों को कुछ शब्द पकड़ाए। उन्होंने उन्हें ध्यान की तरफ इंगित किया।

ध्यान से ही खुलती हैं भीतर की आंखें। इन आंखों पर विचारों की पर्त नहीं जमनी चाहिए। विचारों के बोझ से आदमी की दृष्टि खो जाती है। अलग-अलग विचारों के प्रभाव से आप वह नहीं देख पाते हैं, जो आपको देखना चाहिए। इसलिए ध्यान की पहली शर्त है सभी प्रकार के विचारों से मुक्ति।

बौद्ध धर्म गुरु दलाई लामा कहते हैं कि महात्मा बुद्ध को तभी सच्चा ज्ञान मिल पाया, जब उनमें दया, क्षमा, करुणा, अहिंसा या मानवता के प्रति प्रेम जैसे भाव चरम पर थे। यह सच है कि ये सभी भाव एक दिन में जगाए या पैदा नहीं किए जा सकते हैं। इसके लिए निरंतर प्रयास करते रहना होगा। इसके बीज माता-पिता को बचपन में ही डालने होंगे। समग्र रूप से स्वयं को ज्ञान के माध्यम से जाग्रत करना होगा। स्वयं को अच्छे कर्मो के प्रति मोड़ना होगा। उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति किसी समूह या समुदाय की भलाई के कार्यो में कुछ घंटों के लिए भी स्वयं को समर्पित कर देता है, तो निश्चित ही उसमें दया या क्षमा जैसे भाव उत्पन्न होंगे। ऐसे लोगों में ही अपनी सभ्यता-संस्कृति और दूसरों के प्रति प्रेम-आदर का भाव पनपता है। हमें यदि स्वयं में बदलाव लाना पड़े, तो वह भी कोशिश जरूर करनी चाहिए।

गया के बौद्ध भिक्षु नागसेना बताते हैं कि बुद्ध पूर्णिमा को बौद्ध जगत में त्रिविध जयंती के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि वैशाख पूर्णिमा के दिन ही राजकुमार सिद्धार्थ का जन्म लुंबिनी में, बुद्धत्व की प्राप्ति उरुवेल वन (बोधगया का पुराना नाम) में और उनका महापरिनिर्वाण कुशीनगर में हुआ था।’ वैशाख पूर्णिमा बौद्धों के लिए पवित्रतम दिनों में से एक होता है।

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